• सभी सवालों का जवाब भारतीय प्राचीन पद्धति में हैं
  • अध्यात्म में शक्ति प्राप्ति का बड़ा माध्यम है ध्यान
  • अमेरिकी और यूरोपियन अब भारतीय मेडिटेशन को अपना रहे हैं।
अध्यात्म में शक्ति प्राप्त का बड़ा माध्यम है ध्यान

मेडिटेशन (ध्यान) वो माध्यम है जो सिर्फ न शरीर को निरोगी बनाता है बल्कि अध्यात्म पर आपके विश्वास को भी मजबूत करता है। ध्यान न केवल कार्य क्षमता की शक्ति को बढ़ाता है अपितु आत्मबल को भी उन ऊंचाइयों के शिखर पर ले जाता है, जहां की कल्पना हमने शायद ही कभी की, किंतु निरंतर अभ्यास से यह सब सहज भी संभव हो जाता है।

ओशो ने कहा है कि ध्यान को समझाया नहीं जा सकता अपितु उसको अनुभव किया जा सकता है, उसी तरह से जैसे एच2ओ का फार्मूला प्राप्त कर लेने से हमारी पानी की प्यास नहीं बुझ सकती, उसी तरह से ध्यान को बताने से प्राप्त नहीं किया जा सकता, उसको अभ्यास से अनुभव किया जा सकता है।

मेडिटेशन को लेकर अलग-अलग मत हैं, उसी तरह से जैसे ईश्वर को प्राप्त करने के लिए सदियों से रहे हैं। कोई उनको निराकार मानता हुआ प्राप्त करने का प्रयास करता है तो कोई उनको साकार मानते हुए मूर्ति से प्राप्त करता है। उसी तरह से अनेक मास्टर्स का मत है कि ईश्वर को हम अंधेरों पर विजय प्राप्त कर उस रोशनी को प्राप्त कर सकते हैं जिसके लिए हमारा जन्म हुआ है।

वहीं देवी दुर्गा के एक प्रमुख उपासक स्वामी सत्य ईश्वर आनंद अपने ग्रंथों में बताते हैं कि आदि शक्ति के चरणों में स्वयं को अर्पित कर सच्चा ज्ञान प्राप्त होगा, जब हम देवी दुर्गा का ध्यान करते हैं और उनके दर्शन करने के लिए अभ्यास करते हैं। कुछ शक्तियां हैं जिनको हम अनुभव कर सकते हैं।

स्वामी जी ने अपने जीवन के एक वृतांत का उल्लेख भी किया है। उन्होंने बताया कि वे जब बहुत छोटे थे, कोई 6-7 साल के तो उनको अपने पुराने जन्म की कुछ बातों का अनुभव होता था, वे अपनी माता को इस बारे में अवगत भी करवाते रहे। वक्त बितता चला गया, वे अपने बारे में जानने के बारे में ज्यादा उत्सुक हो गये थे।

उनका कहना है कि जब वे विद्यालय की शुरुआती कक्षाओं में ही जाते थे और दर्पण के सामने खड़े होते थे तो उनको ऐसा लगता था कि वे वह है ही नहीं जो दिखायी दे रहे हैं जो चेहरा है, वह किसी और का है। फिर खुद से सवाल करते कि यह चेहरा किसका है? मैं कौन हूं? सवाल बार-बार परेशान करते थे। उत्तर किसी के पास नहीं था। होता भी किसके पास, किसी के मन में इस तरह के ख्याल आये ही नहीं थे? फिर मेरे मन में क्यों ऐसे सवाल आ रहे थे?

किशोर से युवावस्था की ओर बढ़ रहा था किंतु हर दिन वही सवाल फिर से आता? मैं कौन हूं? इन सवालों की खौज करते हुए कई धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन किया। कुछ राहत मिलती लेकिन फिर से सवाल कौंध जाता-मैं कौन हूं? यह सवाल भूत बन चुका था जो हर दिन पीछा कर रहा था। हर समय साये की तरह साथ रहता था।

उस समय के कुछ बड़े संतों के पास भी गया, क्योंकि उनके पास तो लाखों लोग हर सप्ताह जाते थे। उनके प्रवचनों का ज्यादा असर भी मेरे पर नहीं हो रहा था। 20 साल की आयु होते-होते मैं उदास हो गया था। जब युवा वर्ग जोश में होता है तो उस समय मैं उदास रहता था। उदासीन होकर यही सोचता रहता था कि आखिर मैं कौन हूं।

साल बीत रहे थे। वक्त बीत रहा था किंतु नहीं छूट रहा था तो सवाल का साथ। संतों के प्रवचनों का असर नहीं हुआ तो सोचा कि कुछ दिन मदीरापान कर देख लेते हैं शायद डिप्रेशन का असर हो। कई माह तक मदिरा का सेवन करने के बाद भी असर नहीं हो रहा था और आखिर में वह तस्वीर मिल गयी, जिसकी तलाश थी।
कुछ ऐसे संतों के सम्पर्क में आ गया जो वस्त्र तो हमारे जैसे ही पहनते थे। उनके पास लाखों लोगों की भीड़ भी नहीं थी, किंतु थे वो बड़े संत। वो संत जो दुनिया से दूर रहते थे और खुद की तलाश कर रहे थे। उनके सम्पर्क में आया तो ध्यान के बारे में पता चला। मेडिटेशन की प्रथम क्लास उनके सम्पर्क में की। फिर अभ्यास के मार्ग पर चला।
अभ्यास धीरे-धीरे अनुभव की ओर ले जा रहा था। आखिर में वह दिन आ गया जब मुझे वह ज्ञान प्राप्त हो गया जो शायद घरेलू संतों के तप का प्रताप था। खुद को तलाश लिया। पहले स्वयं से साक्षात्कार हुआ। फिर इन्द्र देवता से साक्षात्कार हुआ। अब हर सवाल का जवाब स्वयं इन्द्र देवता दे रहे हैं। यह उस देवी दुर्गा के आशीर्वाद का प्रताप है। उस आदि शक्ति के आशीर्वाद के बिना सबकुछ अधूरा है।
यह सच है कि बहुत से लोग मेरी तरह स्वयं को तलाश रहे हैं। उनकी खोज कब तक जारी रहेगी, कोई नहीं कह सकता किंतु यह सत्य है कि वे निरंतर अभ्यास और देवी दुर्गा के आशीर्वाद से अवश्य ही एक दिन स्वयं को खोज निकालेंगे। वे पता लगा लेंगे कि मैं कौन हूं। उसी तरह से जैसे मैंने स्वयं को खोज लिया है।

मेडिटेशन वो अनुभव है जिसका नशा किसी के उतारने से भी नहीं उतरता। यह नशा होता तो देरी से है किंतु जब हो जाता है तो उसकी कोई दवा नहीं बनी और इसके निरंतर अभ्यास से उस ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है जिसकी तलाश में अनेक बड़े-बड़े संत घर-बाहर छोड़कर वैरागी हो गये हैं। वे खुद को तलाश रहे हैं। वे ईश्वर को तलाश रहे हैं। सत्य है कि ध्यान बिना ईश्वर को प्राप्त नहीं किया जा सकता। जब ध्यान ईश्वर पर होगा तो वे निश्चित ही ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग भी खोज निकालेंगे, जो इस राह पर निकले हुए हैं।

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