क्राइम पेट्रोल और सावधान इंडिया से हिंसक होता समाज. file photo

पिछले 10 दिनों के दौरान कम से कम तीन ऐसी वारदात सांध्यदीप के सामने आयीं, जो चीख-चीख कर यह संदेश दे रही थीं कि हमको रोका जा सकता था। अगर शासन-प्रशासन चाहता तो अनेक घरों को बर्बाद होने से रोका जा सकता था किंतु इसके लिए कभी विचार नहीं किया गया। कभी ध्यान नहीं दिया गया। केबल टीवी पर प्रसारित होने वाले तीन सीरियल क्राइम पेट्रोल, सावधान इंडिया और हाल ही में आरंभ हुआ मुलजिम हाजिर हो को बंद या उसमें परिवर्तन करके हिंसक होते समाज में बदलाव ला सकते हैं।
सोनी टीवी पर प्रसारित होने वाला क्राइम पेट्रोल, स्टार भारत पर सावधान इंडिया और कलर्स पर देखा जाने वाला मुलजिम हाजिर हो। यह तीनों ही कार्यक्रम क्राइम पर आधारित हैं। तीनों ही काफी लोकप्रिय हैं। यही कारण है कि इनको प्राइम टाइम के तुरंत बाद प्रसारित किया जाता है। यह तीनों ही कार्यक्रम प्रत्येक एपीसोड को सत्य घटना पर आधारित तो बताते हैं किंतु यह नहीं बताते कि हम इन तीनों कार्यक्रमों के माध्यम से पुलिस की जांच पर सवाल उठाकर अपराधियों का हौसला बुलंद करते हैं। यही कारण है कि अपराध जो कभी अपराध बस्ती में बसा करता था, वह अब पॉश इलाकों के बेडरूम तक पहुंच गया है।
इन तीनों सीरियल में मुलजिम को काफी चालाक बताया जाता है और आखिर में यह भी बता दिया जाता है कि अगर अपराधी अमूक गलती नहीं करता तो उसको पकड़ा नहीं जा सकता था। जबकि हकीकत यह है कि पुलिस 90 प्रतिशत मुकदमों में मुलजिम की फेस रीडिंग कर लेती है और फिर अपने स्तर पर जांच कर अपराधी को दबोच लेती है।
पिछले 10 दिनों के दौरान जो ताजा घटनाएं हुईं, उसमें लखनऊ में 24 मार्च 2019 को कृष्णानगर क्षेत्र से एक बैग मिला। बैग के अंदर एक महिला का शव था। उसकी जघन्य हत्या के बाद शव को खुर्द-बुर्द करने के बाद इसको ठिकाने लगाने के उद्देश्य से लखनऊ में फेंका गया। यह घटना बताती है कि इसको किसी टीवी सीरियल को कई बार देखने के बाद अंजाम दिया गया। वहीं राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में एक रिटायर्ड आर्मीमैन का कत्ल कर दिया गया। घटना खुद बता रही थी कि यह बहुत ही प्लानिंग के साथ अंजाम दिया गया।
हत्या करने वाले अथवा प्लानिंग करने वालों को यह गुमान नहीं था रील लाइफ और रियल लाइफ में बहुत ज्यादा अंतर होता है। उसी तरह से दोनों तरह की पुलिस में भी अंतर होता है। जो टीवी पर दिखाया जाता है वो कार्यक्रम को सनसनीखेज बनाने के लिए दिखाया जाता है जबकि रियल में पुलिस वारदात को देखकर ही भांप जाती है कि भाई इसमें बहुत कुछ ऐसा है, जो दिखाया जा रहा है, हम उसके पर्दे के पीछे के सच को देख चुके हैं।
पुलिस फंदे पर लटके शव को देखकर ही पहचान जाती है कि यह आत्महत्या है या हत्या। जिस पुलिस को दो साल से ज्यादा का प्रशिक्षण दिया जाता है। जिस पुलिस के पास अपराध की दुनिया को समझने और उसकी जांच करने का सालों का अनुभव होता है, उसको हम टीवी सीरियल देखकर गुमराह कर सकते हैं। ऐसा संभव नहीं हो सकता। पुलिस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, इसमें सच हो सकते हैं, किंतु पुलिस सच को देख नहीं सके, यह संभव नहीं हो सकता।
टीवी पर प्रसारित होने वाले क्राइम आधारित कार्यक्रम में सैक्स, थ्रिलर और सस्पेंस इसलिए दिखाया जाता है ताकि टीआरपी को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाया जा सके। सरकार तक पहले भी कई पत्र पहुंचे थे और उस समय सरकार ने सीरियल निर्माताओं को पाबंद भी किया था कि वे अपने कार्यक्रम की छवि में सुधार करें, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। अब फिर से सरकार को पत्र लिखने की जरूरत है। यह पत्र आम आदमी भी लिख सकता है। प्रधानमंत्री कार्यालय अथवा सूचना मंत्री को ईमेल-ट्विटर के जरिये भी इन कार्यक्रमों के बारे में आम आदमी बता सकता है और उनको बताना भी चाहिये। यह सिर्फ 5 मिनिट्स का काम है। इससे समाज में बढ़ रहे हिंसक व्यवहार में बदलाव के लिए हम काम कर सकते हैं। अपना योगदान दे सकते हैं। वहीं शासन और प्रशासन को भी इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिये। हम टीवी के माध्यम से समाज को हिंसक बनता नहीं देख सकते।

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