1. भारतीय प्राचीन संस्कृति बताती है कि मेडिटेशन सदियों नहीं युगों पुरानी पद्धति है।
  2. संत ही नहीं बल्कि बड़े-बड़े योद्धा भी निरंतर करते थे अभ्यास
  3. महाभारत काल के अर्जुन भी थे अभ्यासी
क्या महाभारत के अर्जुन और रामायण के बाली भी ध्यान करते थे?file photo

मेडिटेशन युगों से भारतीय सभ्यता का हिस्सा रहा है। स्वयं और ईश्वर की खोज के लिए हमारे साधु-संत निरंतर ध्यान का अभ्यास करते थे। ईश्वर को प्राप्त कर हमारे लिये ज्ञान का भंडार छोड़कर जाते थे।
लगभग एक हजार साल तक भारतीय ही नहीं बल्कि हिन्दुस्तान की संस्कृति व सभ्यता भी अतिक्रमणकारियों की गुलाम रही। दूसरी संस्कृति के प्रभावशाली लोग हमारी सभ्यता का अंग-भंग करते रहे। यही कारण है कि आज हम अपनी शक्ति मेडिटेशन को भूलते जा रहे हैं और काल्पनिक सुख की तलाश में भटक रहे हैं। रियल एन्जवॉय क्या होता है? यह हमें पता ही नहीं रहा।
पश्चिमी सभ्यता और अमेरिकी अपनी नीरस जिंदगी से दुखी होकर भारतीय संस्कृति को अपना रहे हैं, जो कुछ दशक पहले तक हमारी मेडिटेशन और योग पद्धति का मजाक उड़ाया करते थे, उस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए वे लाखों डॉलर की फीस देने को तैयार हैं। वे सैक्स और नशे की दुनिया से अलग होना चाहते हैं। खुद को तलाश करना चाहते हैं। उनको पता लग गया है कि मेडिटेशन ही वो शक्ति है, जो सच्चा आनंद दे सकती है। खुद को तलाशने में मदद कर सकती है। स्वयं को तराशने में सहायक हो सकती है।
अगर हम महाभारत काल की बात करें तो आपको याद होगा कि द्रोपदी स्वयंवर में बड़े-बड़े योद्धा आये हुए थे किंतु मछली की आंख का निशाना सिर्फ अर्जुन लगा सके थे। वे अगर इतने विद्वान योद्धा बने तो इसके पीछे मुख्य कारण यह था कि वे निरंतर अभ्यास करते थे। अभ्यास से उन्होंने अनुभव प्राप्त किया और फिर अनुभव से लक्ष्य को प्राप्त करने की शक्ति हासिल की।
यही कारण था कि जब सभी लोगों का ध्यान द्रोपदी की सुुंदरता पर था तो उस समय भी अर्जुन ने अपनी इन्द्रियों पर जीत हासिल की। उनका “ध्यान” सिर्फ और सिर्फ मछली की आंख पर था। स्वयं को वापिस इसी आर्टिकल पर लाते हुए दुबारा पढिय़े कि अर्जुन का “ध्यान” आंख पर था। याने वे ध्यानी थे। वे अभ्यासी थे। निरंतर अभ्यास से ही उन्होंने ध्यान को प्राप्त किया।
वहीं अगर हम रामायण काल के पात्र सुग्रीव के भाई बाली की बात करें तो हमें पता चलता है कि वह भी काफी शक्तिशाली थे। उनकी शक्ति का कारण भी यही था कि वे भी अभ्यासी थे। जब वे युद्ध करते थे तो उनका ध्यान सिर्फ और सिर्फ युद्ध पर होता था। एक क्षण के लिए भी वे अपने लक्ष्य से भटकते नहीं थे। यह सब उन्होंने ध्यान याने मेडिटेशन के निरंतर अभ्यास से प्राप्त किया था। वे युद्ध की कला में इतने निपुण हो गये थे कि उनको पता लग जाता था कि दुश्मन का अगला वार क्या होगा। इसी कारण कहा जाता है कि वे आधी शक्ति दुश्मन की हासिल कर लेते थे। जब हमें यह ज्ञात हो जाता है कि दुश्मन का अगला वार क्या होगा, तो हम आधा युद्ध तो वैसे ही जीत लेते हैं।
दुश्मन किसी भी रूप में हो सकता है। इन्द्रियां भी हो सकती हैं। हमारा अहित करने वाला, हमारे धर्म को नष्ट करने वाला मनुष्य भी हो सकता हे। जब हम निरंतर अभ्यास करते हैं। ध्यान करते हैं। इस प्रयास से हम अपनी इन्द्रियों पर विजय हासिल कर सकते हैं और फिर सिर्फ टारगेट को प्राप्त कर सकते हैं। जब इन्द्रियों पर जीत हासिल होगी तो कोई भी इन्द्री हमें दर्द नहीं देगी, हम एक ही क्षेत्र पर अपनी पूरी शक्ति लगा सकेंगे।
पुरातण काल के यह दो पात्र ही ध्यानी नहीं थे बल्कि और भी बहुत से थे। सांध्यदीप लगातार कौशिश करेगा कि आप तक भारतीय संस्कृति के उन सभी अभ्यासियों से आपको परिचित करवायें, जिन्होंने हमारे को ज्ञान का अटूट भंडार दिया। वह भंडार जो हमें निरोगी ही नहीं बनाता बल्कि अतुल्य बनाता है।

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