मां आदि शक्ति दुर्गा से साक्षात्कार का मंत्र

सनातन धर्म के वेद और अन्य महान धर्मग्रंथों ने मां भगवती की स्तुति की है। महाभारत काल के बाद जो विनाश हुआ, उससे व्यथीत होकर अनेक महान साधु-संतों ने स्वेच्छा से प्राणों की आहूति दे दी थी। उससे हिन्दू धर्म को बहुत ही ज्यादा क्षति हुई थी। हिन्दू धर्म की मान्याताओं को गहरा आघात लगा। पिछले एक हजार सालों के दौरान हिन्दू धर्म की संस्कृति को अतिक्रमणकारियों ने विलुप्त करने का प्रयास किया किंतु गुरु अर्जुन देव जी, गुरु तेग बहादुर जी और गुरु गोविंद सिंह ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए तत्कालीन शासकों से युद्ध किया। हिन्दू धर्म अगर जीवित है, तो इनकी कुर्बानियों और इनके योगदान को कभी नहीं भुला सकता।

नवरात्रि में मां दुर्गा की स्तुति की जाती है। उसके अनेक अवतार और रूप की पूजा की जाती है। शस्त्रों की पूजा की जाती है। कन्याओं का पूजन होता है। उनको हलवा-पुरी का प्रसाद खिलाया जाता है। उस मां दुर्गा की प्राप्ति का आखिर राज क्या है। इसको लेकर अनेक मत हैं, किंतु ध्यान लगाकर अगर आदि शक्ति की पूजा की जाती है और मंत्रों का सही उच्चारण किया जाता है, तो माना जाता है कि आदि शक्ति दुर्गा अवश्य ही अपने उपासक को दर्शन देती है।
हिन्दू धर्म में मां दुर्गा को आदि शक्ति के रूप में पहचाना जाता है। चारों वेद यर्जुेवेद, सामवेद, ऋग्वेद और अर्थववेद में मां आदि शक्ति दुर्गा की ही स्तुति की गयी है। सिख धर्म में भी अकाल पुरुख की ही पूजा होती है। अकाल का अर्थ होता है आदि अर्थात जिसका कोई अंत नहीं। जो अनंत है। जो सबसे पहले था, जो सबके अंत के बाद भी रहेगा। पुरुख का अर्थ होता है शक्ति।
मेडिटेशन को हिन्दी में ध्यान कहा जाता है और ध्यान का अर्थ होता है, किसी के प्रति एकाग्रचित होकर उसको याद करना। निरंतर अभ्यास से अनुभव की प्राप्ति होती है जो मां दुर्गा की प्राप्ति तक लेकर जाती है। इस अनुभव को प्राप्त करने वाला ऐसा आनंद प्राप्त करता है, जो संभवत: उसने कभी भी नहीं प्राप्त किया।
मां भगवती की स्तुति के लिए उसका मंत्र का जाप, ऐं हृीं क्लीं चमुण्डाय विच्चे भी किया जाता है। अगर निरंतर ध्यान से इस मंत्र का जाप किया जाये, तो मनुष्य दुर्लब हो जाता है। उसको वो ज्ञान प्राप्त होता है, जिसके लिए वह ईधर-उधर भटकता रहा है। ध्यान के माध्यम से ही मनुष्य आदि शक्ति देवी दुर्गा से साक्षात्कार के अनुभव तक पहुंच जाता है और इस तरह से ध्यान ही ईश्वर प्राप्ति का एक मात्र मार्ग है। अभ्यास, अनुभव और समाधि तक सफर लम्बा रहता है, लेकिन फलदायी होता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here