नोटबंदी ने खोले डबल मर्डर के राज file photo

श्रीगंगानगर। जो यह सोचते हैं कि 12 बज गये हैं तो फिर 11 नहीं बजेंगे अथवा जो यह जवाब तलाश नहीं पाये कि ईश्वर ने जब सृष्टि की रचना की तो उन्होंने पृथ्वी को गोल क्यों बनाया था? वहीं तीसरा प्रश्न यह भी लोगों के मन में आता है कि नोटबंदी से आखिर देश को क्या लाभ हुआ। इन तीनों ही प्रश्रों का उत्तर आज आपको एक ही खबर में मिल जायेंगे।
खबर को आरंभ करने से पहले आप इस उदाहरण को देखिये, रामलाल और श्यामलाल पार्क में एक साथ मुख्य द्वार से प्रवेश करते हैं। रामलाल मार्निंग वॉक के लिए राइट साइड की तरफ जाता है और श्यामलाल लेफ्ट साइड से गोल पार्क में घूमता है। वह जब एक चक्कर लगाते हैं तो वह दो बार आमने-सामने होते हैं। अर्थात जो व्यक्ति एक दिशा से दूसरी दिशा की तरफ जाता है तो उस व्यक्ति को दो बार उन चीजों का सामना करना पड़ता है, एक बार उसके पक्ष में हो सकती हैं किंतु यह संभव नहीं है कि दूसरी बार भी वह उसके पक्ष में होंगी। इसी तरह से घड़ी में कभी भी 13 नहीं बजते हैं। 12 बजे के बाद वह अपनी गिनती पुन: 1 बजे से ही आरंभ करती है। इस तरह से उस दिन ही उस घड़ी में पुन: 11 बजते हैं। इससे यह भी संदेश मिलता है कि अगर आपने किसी का बुरा कर दिया है तो इसका मतलब यह नहीं है कि उस तरह का वक्त फिर नहीं आयेगा, जब पीडि़त आपसे हिसाब नहीं मांगेगा।
तीसरा प्रश्न हर किसी व्यक्ति के मन में है कि आखिर नोटबंदी का देश को क्या लाभ हुआ। सच यह है कि नोटबंदी के बाद जो धोखाधड़ी और शैल कंपनियों से सिस्टम को मैनेज करते थे, वो अब अदालत में पेश होकर गुहार लगा रहे हैं। रहम की भीख मांग रहे हैं। जो कभी वक्त को अपने कब्जे में होना बताते थे आज वही वक्त उनसे हिसाब मांग रहा है। कभी रंक से राजा तक बनने वाले लोग नरेन्द्र मोदी के एक ही वार से जमीन पर आ गये। छल-कपट से कमाया हुआ धन एक ही झटके में चला गया। हालांकि उन लोगों को भी भारी परेशानी हुई है जो मजदूरी कर पेट पालते थे, लेकिन यह परेशानी ज्यादा दिन की नहीं है। इस समाचार को पढऩे के बाद आपको बहुत कुछ अनुभव होगा।

यह नोटबंदी ही थी कि 18 सालों बाद डबल मर्डर का खुलासा हो पाया। या यूं कहा जा सकता है कि मोदी के एक तीर से मुर्दे कफन से बाहर आ गये। वे बोलने लगे, हमारी हत्या हुई है। हमारे को इंसाफ दो। एक ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी की मेहनत की बदौलत यह संभव हो पाया। हालांकि इसकी शाबाशी तो कुछ और लोग ही ले गये।
लगभग 18 साल पुरानी इस घटना का रिकॉर्ड हासिल करने के लिए सांध्यदीप को काफी मेहनत करनी पड़ी। अनेक पुलिस अधिकारियों, पत्रकारों से बात की गयी। अदालत में पुलिस की ओर से पेश किये गये दस्तावेजों को प्राप्त किया गया और आखिर में यह खबर 18 साल पहले जो सामने आने चाहिये थी, वो आज आ रही है। हालांकि इस खबर का कुछ हिस्सा पहले प्रकाशित हो चुका है किंतु बहुत सी सच्चाई ऐसी है जो मर्डर के खुलासे के बाद भी सामने नहीं आ पायी थी। उस सच्चाई को ही आपसे रूबरू करवा रहे हैं।
इस घटना की शुरुआत होती है 16 दिसंबर 2002 को जब हरियाणा के हिसार जिले की एक महिला रावतसर पुलिस थाना में हाजिर होती है। महिला ने तत्कालीन पुलिस अधिकारियों को बताया और अधिकारियों ने मुकदमा तो दर्ज कर लिया किंतु जांच नहीं की। इसका असर यह हुआ कि रावतसर में ही एक और मर्डर हो गया। अगर उस समय ही पुलिस ने कार्यवाही को कर दिया होता तो आज हरवीर सहारण जीवित होते।
बिमला देवी पत्नी बद्रीप्रसाद सोनी निवासी हिसार ने रिपोर्ट दी कि उसके पुत्र लीलाधर का हरवीर सहारण, ओमप्रकाश आदि ने अपहरण कर लिया है। वे उसकी हत्या भी कर सकते हैं। पुलिस ने एफआईआर 218/02 दर्ज कर ली। उस समय रावतसर पुलिस थाना में एसआई स्तर का अधिकारी एसएचओ हुआ करता था। मामला दर्ज हो गया और दर्ज ही रहा। कोई जांच नहीं। वक्त बीतता चला गया। इस दौरान प्रेम अहिरावणा नामक एक और युवक लापता हो चुका था। उसके अपहरण का शक भी हरवीर सहारण पर ही था।
सूबह होती और सांझ हो जाती, बिमला अपने पुत्र लीलाधर के वापिस आने का इंतजार करती। इंतजार लम्बा होता चला गया, लीलाधर नहीं आया। आखिर में उसने भी पुलिस थाना में जाना बंद कर दिया था क्योंकि पुलिस कोई कार्यवाही नहीं कर पा रही थी। हरवीर सहारण राजनीति में प्रवेश कर मजबूत होता चला गया। पुलिस अधिकारियों की हिम्मत ही नहीं थी।
हनुमानगढ़ जिले में नियुक्त रहे, एक पुलिस अधिकारी बताते हैं, 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद नोटबंदी हो गयी। नोटबंदी के दौरान हनुमानगढ़ जिले के ही एक व्यापारी के पास एक करोड़ से ज्यादा का कैश था, उसको चिंता हो गयी कि वह इसको अब बदलवायेगा कैसे। इस दौरान उसकी मुलाकात वजीर खान नामक युवक से हुई। वजीर खान ने उसको झांसा दिया और एक करोड़ से ज्यादा का कैश लेकर वह बदलवाने का वादा कर चला गया। इसके बाद वह गायब हो गया तो व्यापारी के रिश्तेदार ने डकैती का मुकदमा दर्ज करवा दिया। पुलिस में भी अच्छे अधिकारी होते हैं, इसका प्रमाण एक बार फिर से मिला। ओम गोदारा नामक पुलिस इंस्पेक्टर ने वजीर खान को दबोच लिया। उससे पूछताछ की गयी तो उसने प्रेम कालीरावणा और लीलाधर सोनी की हत्या का राज खोल दिया। वजीर खां ने पुछताछ में हरवीर सहारण, पप्पूराम मेघवाल, भीम बेनीवाल, रणजीत मेघवाल, मांगेस तारण के साथ मिलकर प्रेमकुमार की हत्या कर शव जलाना स्वीकार किया। लगभग 16 साल पहले हुई हत्याओं का राज एक सूझबूझ वाले पुलिस अधिकारी ने खोल दिया। अगर श्री गोदारा सिर्फ धन बरामदगी के बाद पूछताछ नहीं करते तो यह वारदात सामने ही नहीं आती। उन्होंने अपने अनुभव का इस्तेमाल किया। ओम गोदारा ने आरोपी वजीर खां के 164 सीआरपीसी में अदालत में बयान पंजीबद्ध करवा दिये। अदालत में बयान होने के बाद अब इसमें कोई शक नहीं था कि वजीर खां ने दोनों हत्या की वारदात कबूल कर ली है।
होना तो यह चाहिये था कि डेढ़ दशक पुरानी हत्या की दो वारदात का राजफाश करने वाले पुलिस अधिकारी ओम गोदारा को विशेष पदोन्नति दी जाती, लेकिन इसके बाद उच्चाधिकारियों ने वो घिनौना खेल खेला, जो आज तक मीडिया में नहीं आया।
हनुमानगढ़ पुलिस ने इसके बाद फाइलों को बाहर निकाला और हत्या के मामले की जांच शुरू की। जांच आरंभ हो रही थी और हरवीर सहारण को गिरफ्तारी दिखायी दे रही थी। आरोपी हरवीर सहारण ने इसके बाद दलालों के माध्यम से आईजी से कॉन्टेक्ट किया। आईजी विपिन कुमार पाण्डेय जो अब कोटा के आईजी हैं, उस समय बीकानेर रेंज में नियुक्त थे। पाण्डेय ने अपने सबसे विश्वास पात्र अधिकारी और रायसिंहनगर सैक्टर के तत्कालीन एडीशनल एसपी भरतराम को जांच अधिकारी बना दिया। भरतराम ने मामले में एफआर लगा दी।
डबल मर्डर केस। जिसका डेढ़ दशक बाद खुलासा हो रहा था, उस मामले में आईजी और एडीशनल एसपी मिलकर एफआर लगा देते हैं। आरोपी दोनों अधिकारियों का रिश्तेदार तो थे नहीं। इसके बदले में मोटी रकम का लेनदेन हुआ। हनुमानगढ़ जिले में नियुक्त रहे पुलिस अधिकारी की बातों पर यकीन करें तो दोनों अधिकारियों ने 46 लाख में सौदा किया था।
दोनों केस में जैसे ही एफआर लगती है तो मामले की गूंज जयपुर तक जाती है। दोनों अधिकारी लगभग 50 लाख रुपये डकार चुके थे। इस तरह से दोनों के परिवारजनों तक पुलिस अधिकारी ही खबर पहुंचाते हैं कि अब बीकानेर रेंज में पुलिस कुछ नहीं करेगी, इस मामले को जयपुर लेकर ही जाना होगा। परिवारजन तत्कालीन डीजीपी से मिलते हैं और मामले को एसओजी को सौंप दिया जाता है।
उस दिन तारीख 14 मई 2018 थी। एसओजी के तत्कालीन एडीजी ने पत्रकार वार्ता बुलायी और बताया कि रावतसर नगरपालिका अध्यक्ष के पति हरवीर सहारण को गिरफ्तार किया गया है। जिस मामले का खुलासा पुलिस निरीक्षक ओम गोदारा पहले ही अपनी सूझबूझ से कर चुके थे, उस बारे में एडीजी और तत्कालीन आईजी श्रेय लेते हैं। वे यह तो बताते हैं कि इस मामले में पुलिस ने दो बार एफआर लगा दी थी लेकिन पुलिस अधिकारी बहुत कुछ बताने से गुरेज करते हैं।
एसओजी के तत्कालीन अधिकारियों को पता लग गया था कि आईजी विपिन कुमार पाण्डेय और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक भरतराम ने 46 लाख रुपये लिये हैं। इस घटना के बाद हरवीर सहारण को वह रकम तो दोनों अधिकारी वापिस कर देते हैं, लेकिन एसओजी इसको रिकॉर्ड में नहीं लेती। एसओजी के इंचार्ज भी आईपीएस थे। आईजी भी आईपीएस ही होता है जिसके खिलाफ शिकायत थी, वह भी आईपीएस था। लिहाजा विपिन कुमार पाण्डेय तो उनके भाई हो गये। आईपीएस-आईपीएस भाई-भाई। भरतराम जी आईपीएस नहीं थे। वे राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी थे अर्थात पुलिस वाले तो थे, किंतु बराबर के नहीं थे। इस कारण उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही की अनुशंषा कर दी गयी।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का दुखद पहलू यह भी है कि जिस हरवीर सहारण को जेल में होना चाहिये था, वह आज इस दुनिया में ही नहीं है। सत्ता सुख बहुत से लोगों का दुश्मना बना देता है। 24 सितंबर 2018 की सुबह रावतसर एसडीएम कार्यालय में सरेआम गोलियां चलाकर हरवीर की हत्या कर दी गयी। इस मामले में महेन्द्र पूनिया, रामनिवास महला आदि को गिरफ्तार किया जा चुका है।
इस पूरे घटनाक्रम से अनेक सवालों के जवाब मिलते हैं। सच यह है कि वक्त कभी किसी का नहीं होता। पल ही में वह किसी को भी मिट्टी और पल में ही किसी को सोना बना देता है। हरवीर सहारण जिस पर दो हत्याओं का मुकदमा था, उसकी हत्या उस समय की गयी जब वह अपनी लोकप्रियता की चरम पर था। नोहर से विधानसभा चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहा था। उससे पहले ही वह दुश्मनों की गोलियों का निशाना बन गया।

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